पब्लिक स्वर,गरियाबंद। गरियाबंद जिले के अमलीपदर तहसील मुख्यालय में आयोजित सुशासन तिहार शिविर उस वक्त चर्चा का केंद्र बन गया, जब पूर्व भाजपा संसदीय सचिव और क्षेत्र के वरिष्ठ नेता गोवर्धन मांझी ने मंच से ही प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोल दिया। जिला कलेक्टर भगवान सिंह उइके की मौजूदगी में मांझी ने अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों की बात तक नहीं सुनी जाती और आम लोगों की छोटी-छोटी समस्याएं महीनों तक लंबित पड़ी रहती हैं।
कार्यक्रम के दौरान मांझी ने साफ शब्दों में कहा कि पानी, बिजली और बुनियादी सुविधाओं को लेकर ग्रामीण लगातार जनप्रतिनिधियों के पास पहुंचते हैं, लेकिन जब इन समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाया जाता है तो अधिकारी फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझते। उन्होंने मंच से कलेक्टर को संबोधित करते हुए कहा,
“कलेक्टर साहब, आप फोन तो उठा लिया करें। छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान ऐसे ही हो जाता है। लोग आवेदन देकर थक चुके हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही।”
“सिर्फ शिविर लगाने से नहीं बदलेगी व्यवस्था”
गोवर्धन मांझी ने सुशासन तिहार की अवधारणा पर सीधे सवाल नहीं उठाए, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर प्रशासन की गंभीरता पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि केवल शिविर आयोजित कर देने से समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।
उन्होंने कहा, “शिविर कोई जादू की छड़ी नहीं है कि सारी समस्याएं एक दिन में खत्म हो जाएं। सरकार की मंशा अच्छी हो सकती है, लेकिन सिस्टम में सुधार जरूरी है।”
उनके इस बयान को स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था पर सार्वजनिक असंतोष के रूप में देखा जा रहा है। आमतौर पर सरकारी कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि मंच साझा करते हुए संयमित टिप्पणी करते हैं, लेकिन मांझी का खुला बयान कई संकेत छोड़ गया।
खाली कुर्सियों पर भी उठाए सवाल
शिविर में अपेक्षा के मुकाबले कम भीड़ और बड़ी संख्या में खाली कुर्सियां दिखाई देने पर भी मांझी ने प्रशासन को घेरा। उन्होंने कहा कि यदि सरकार की योजनाओं और शिविरों का सही तरीके से प्रचार-प्रसार किया जाता तो लोगों की ज्यादा भागीदारी दिखाई देती।
उनका कहना था कि खाली पंडाल इस बात का संकेत है कि प्रशासन सरकार की मंशा के अनुरूप गंभीरता से काम नहीं कर रहा।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज
मंच से दिए गए इस बयान के बाद कार्यक्रम का माहौल कुछ देर के लिए राजनीतिक हो गया। स्थानीय स्तर पर इसे जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, राजनीतिक गलियारों में भी मांझी के बयान को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अब देखना होगा कि मांझी के सार्वजनिक बयान के बाद प्रशासनिक स्तर पर कोई बदलाव या प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं।

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