पब्लिक स्वर,जगदलपुर। बस्तर संभाग के ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक परिवहन की बदहाल व्यवस्था लोगों की जान पर भारी पड़ रही है। गांवों तक नियमित बस सेवाएं नहीं पहुंचने के कारण हजारों ग्रामीण ट्रैक्टर, पिकअप और अन्य मालवाहक वाहनों में सफर करने को मजबूर हैं। नतीजतन आए दिन सड़क हादसे हो रहे हैं, जिनमें लोगों की जान जा रही है और दर्जनों घायल हो रहे हैं।
बीते कुछ महीनों में सामने आए दो बड़े हादसों ने ग्रामीण परिवहन व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। 6 अप्रैल को दरभा क्षेत्र में एक ट्रैक्टर पलटने से 15 लोग घायल हो गए थे। जानकारी के अनुसार, ट्रैक्टर में क्षमता से कई गुना अधिक, 50 से ज्यादा ग्रामीण सवार थे, जो एक मेले में शामिल होने जा रहे थे।
इसके बाद लोहंडीगुड़ा थाना क्षेत्र के ढाबामारी गांव में शादी समारोह से लौट रही एक पिकअप वाहन पलट गई थी। वाहन में 45 से अधिक लोग सवार थे। हादसे में 37 ग्रामीण घायल हुए, जबकि दो लोगों की मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित यातायात व्यवस्था की कमी को सामने ला दिया।
मजबूरी में खतरे भरा सफर
ग्रामीणों का कहना है कि कई गांवों में नियमित बस सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में शादी, बाजार, अस्पताल या सामाजिक कार्यक्रमों में जाने के लिए लोगों के पास ट्रैक्टर, पिकअप और अन्य मालवाहक वाहनों का सहारा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यही मजबूरी अक्सर बड़े हादसों का कारण बन रही है।
कार्रवाई के बावजूद नहीं बदल रही तस्वीर
परिवहन विभाग और पुलिस समय-समय पर मालवाहक वाहनों में सवारी ढोने के खिलाफ अभियान चलाते हैं और कार्रवाई भी करते हैं। नियमों के मुताबिक मालवाहक वाहनों में यात्रियों को बैठाना गैरकानूनी है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्यवस्था खुलेआम जारी है, क्योंकि वैकल्पिक सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं है।
व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
लगातार हो रहे हादसों के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि जब गांवों तक पर्याप्त बस सेवाएं नहीं पहुंच रही हैं तो लोगों को सुरक्षित यात्रा का विकल्प कौन उपलब्ध कराएगा? हर दुर्घटना के बाद कार्रवाई और जांच की घोषणा तो होती है, लेकिन जमीनी हालात में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आता।
बस्तर के ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित और नियमित सार्वजनिक परिवहन की मांग लंबे समय से उठ रही है। जब तक गांवों तक भरोसेमंद परिवहन व्यवस्था नहीं पहुंचती, तब तक ग्रामीणों का यह जोखिम भरा सफर जारी रहने की आशंका बनी रहेगी। ऐसे में जरूरत केवल नियमों के पालन की नहीं, बल्कि ग्रामीणों को सुरक्षित यात्रा का व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की भी है।

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