पब्लिक स्वर,छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक महत्व के स्थलों पर संरक्षण के नाम पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का खेल उजागर हो रहा है।पहले सिरपुर में अरबों के घोटालों को पब्लिक स्वर की टीम ने खुलासा किया जिसने एक ही इंजीनियर, एक ही ठेकेदार और एक जैसे फर्जी कार्यों के जरिए अरबों की बंदरबांट की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जहां कार्य की कोई आवश्यकता नहीं, वहीं कागजों में बड़े-बड़े टेंडर निकालकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर सर्किल में सबसे अधिक टेंडर रायपुर सर्किल से निकाले जा रहे हैं। एस्टीमेट को इस कदर बढ़ाया जाता है कि वास्तविक काम मात्र 10 से 20 प्रतिशत ही होता है, जबकि शेष राशि अधिकारियों और ठेकेदारों की जेब में चली जाती है। वर्षों तक इन कार्यों का न तो निरीक्षण होता है और न ही विजिलेंस की कोई कार्रवाई दिखाई देती है।
सिरपुर–रतनपुर बना भ्रष्टाचार का हॉटस्पॉट
सिरपुर और रतनपुर जैसे ऐतिहासिक स्थलों को ठेकेदारों ने टारगेट बना लिया है। पहले भी शिकायतों और के बाद विभाग ने नोटिस देकर भुगतान रोका था और कहा था कि ठेकेदार के ऐसे कार्यों से स्मारकों की अस्मिता को नुकसान हो रहा है। लेकिन इसके बाद पूरा खेल सीधे अधिकारियों के हाथ में चला गया। सिरपुर में पदमपाणी, एसआरपी-16, एसआरपी-13, रायकेरा टैंक और एसआरपी-4 जैसे स्थलों पर करोड़ों के टेंडर निकालकर मेंटेनेंस के नाम पर घोटाले किए गए। खुलासों के बाद लीपापोती करते हुए केवल 10 प्रतिशत काम कर मामले को दबाने की कोशिश की गई।
सिरपुर में बंदरबांट करने के बाद रतनपुर भी रडार में:30 लाख का काम 2.70 करोड़ में!
रतनपुर के प्राचीन गज किला परिसर में हालिया टेंडर ने भ्रष्टाचार की नई कहानी लिख दी। लगभग 2 करोड़ 59 लाख के कार्य को सेटिंग के जरिए बढ़ाकर 2 करोड़ 73 लाख में ठेकेदार को दे दिया गया।
जिस पाथवे और टैंक में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं थी, वहां फर्जी BOQ बनाकर करोड़ों का काम दिखाया गया। 3000 वर्गमीटर में नए पत्थरों की पिचिंग का प्रावधान दिखाया गया, जबकि वास्तविकता में पुराने पत्थरों का ही उपयोग कर पूरा पैसा निकाल लिया गया। यहां तक कि टैंक में पानी न होने के बावजूद 3000 गैलन पानी निकालने का फर्जी बिल तक लगा दिया गया।
नियमों की धज्जियां, जेसीबी से तोड़ी विरासत
पुरातात्विक स्थलों पर मशीनों के उपयोग पर प्रतिबंध होने के बावजूद खुलेआम जेसीबी चलाकर कार्य किया गया। इससे न केवल नियमों का उल्लंघन हुआ बल्कि कई प्राचीन अवशेष भी नष्ट हो गए। ऐसे मामलों में सीधे एफआईआर का प्रावधान है, लेकिन ठेकेदार और अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
काम अधूरा, भुगतान पूरा
गज किला के लक्ष्मीनारायण मंदिर और टैंक सुधार कार्य का टेंडर 3-4 साल पहले हुआ था, लेकिन आज तक कार्य अधूरा पड़ा है। शर्तों के अनुसार नए और पुराने पत्थरों का मिश्रण होना था, परंतु 100 प्रतिशत पुराने पत्थरों का उपयोग कर पूरा भुगतान निकाल लिया गया। इतना ही नहीं, गेट नंबर 3 का मूल स्वरूप ही बदल दिया गया, जो संरक्षण के नियमों का खुला उल्लंघन है।
भ्रष्ट ठेकेदार और अधिकारी मिलीभगत कर छोटे टेंडर की जगह निकाल रहे बड़े टेंडर
बताते हैं कि एक ही ठेकेदार को फायदा पहुंचाने विभाग जानबूझ कर छोटे टेंडरों को ना निकाल कर संयुक्त रूप से बड़े टेंडर निकालता है ताकि राम किशोर झा को इसका टेंडर मिल सके। यही कारण है कि पिछले 25 सालों से राम किशोर झा और उसके भाई और भाभी की फर्म मा शारदा कंस्ट्रक्शन को ही 90 फीसदी से ज्यादा टेंडर मिलते हैं। यहां तक कि एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट में भी बड़ा झोलझाल होने की खबर है।
रीजनल डायरेक्टर भी काले खेल में शामिल
थोड़े दिन पूर्व जब पब्लिक स्वर ने रीजनल डायरेक्टर अरुण राज से बात की तो उन्होंने कहा इस संदर्भ में SA कालीमुथू को निर्देश दिया गया है। वहीं जब SA कालीमुथू से बात हुई तो उनका कहना था कि कोई निर्देश नहीं आया है। मतलब साफ है अंधा गुरु बेहरा चेला दोनों के बीच में ठेलम ठेला।
बड़ा सवाल
आखिर कब तक छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक धरोहरों को इस तरह लूटा जाता रहेगा? आखिर कब सतर्कता विभाग काले कारनामों पर सतर्क होकर कार्यवाही करेगा।
कब जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी?
और क्या सरकार इस संगठित भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाएगी, या फिर धरोहरें यूं ही “घोटालों का स्मारक” बनती रहेंगी?

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