भाजपा नेता की हत्या के आरोपी ने उपचुनाव में ठोकी ताल, हथकड़ियों में पहुंचकर भरा नामांकन



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पब्लिक स्वर,कोरबा। कोरबा जिले की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। भाजपा नेता अक्षय गर्ग की हत्या के मामले में जेल में बंद मुख्य आरोपी मुस्ताक अहमद अब उसी सीट से चुनाव लड़ने मैदान में उतर गया है, जो हत्या के बाद खाली हुई थी। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति के साथ-साथ कानून, नैतिकता और चुनावी व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला पोड़ी उपरोड़ा जनपद पंचायत क्षेत्र की बिझरा सीट का है। सोमवार को नामांकन के अंतिम दिन बिलासपुर जेल से कड़ी सुरक्षा के बीच मुस्ताक अहमद को नामांकन दाखिल कराने लाया गया। हथकड़ियों में पुलिस सुरक्षा के बीच पहुंचे मुस्ताक ने जनपद सदस्य पद के लिए अपना नामांकन दाखिल किया। जेल वैन के पहुंचते ही इलाके में लोगों की भीड़ जमा हो गई और पूरे क्षेत्र में चर्चा का माहौल बन गया।

दिनदहाड़े हुई थी भाजपा नेता अक्षय गर्ग की हत्या

गौरतलब है कि 23 दिसंबर को ग्राम केशलपुर में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व जनपद उपाध्यक्ष अक्षय गर्ग की निर्मम हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने उन पर कुल्हाड़ी और चाकू से ताबड़तोड़ हमला किया था, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। इस घटना ने पूरे कोरबा जिले को झकझोर दिया था।

पुलिस जांच में सामने आया कि हत्या के पीछे राजनीतिक रंजिश प्रमुख कारण थी। जांच के बाद मुस्ताक अहमद को मुख्य आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार किया गया। तब से वह जेल में बंद है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

अब उसी सीट से चुनाव लड़ने उतरा आरोपी

अक्षय गर्ग की हत्या के बाद बिझरा जनपद पंचायत सीट रिक्त हो गई थी। निर्वाचन आयोग द्वारा यहां उपचुनाव की घोषणा की गई। लेकिन नामांकन के आखिरी दिन जो तस्वीर सामने आई, उसने सभी को चौंका दिया। हत्या के आरोपी मुस्ताक अहमद ने उसी सीट से चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया, जिस सीट के प्रतिनिधि की हत्या के मामले में वह आरोपी है।

यह घटनाक्रम कानूनी रूप से भले संभव हो, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर बहस तेज है कि हत्या जैसे गंभीर मामले का आरोपी चुनावी मैदान में उतर रहा है।

कानून क्या कहता है?

भारतीय चुनाव कानून के अनुसार केवल आरोप तय होने या जेल में बंद होने भर से कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं हो जाता। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत तब तक चुनाव लड़ने पर रोक नहीं लगती, जब तक किसी मामले में अदालत द्वारा दोषसिद्धि न हो जाए और दो वर्ष या उससे अधिक की सजा न सुनाई गई हो। यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले मुस्ताक अहमद चुनाव लड़ने के पात्र बने हुए हैं।

हालांकि, ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों और समाज की नैतिक जिम्मेदारी को लेकर बहस लगातार होती रही है। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जता चुका है।

इलाके में बढ़ी सुरक्षा, गर्माया सियासी माहौल

मुस्ताक अहमद के नामांकन के बाद बिझरा और आसपास के इलाकों में राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्म हो गया है। प्रशासन ने किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है। स्थानीय स्तर पर समर्थकों और विरोधियों के बीच चर्चाओं का दौर जारी है।।



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