पब्लिक स्वर,कवर्धा। कबीरधाम जिला इतिहास, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहरों का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ‘ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान’ के तहत जिले में 38 दुर्लभ और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पहचान की गई है। कलेक्टर गोपाल वर्मा के मार्गदर्शन में हुए इस सर्वेक्षण ने मध्यभारत के इतिहास, साहित्य, धर्म, विज्ञान और लोकजीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सामने लाया है।
375 वर्ष पुरानी पाक-कला पांडुलिपि बनी खास आकर्षण
सर्वेक्षण में मिली सबसे अनोखी धरोहर लगभग 375 वर्ष पुरानी तालपत्र (पाम लीफ) पांडुलिपि है। बंगाली भाषा में लिखी गई यह पांडुलिपि प्राचीन पाक-कला (कुकिंग आर्ट) से संबंधित है। विशेषज्ञों के अनुसार यह दस्तावेज उस समय की खानपान संस्कृति, जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत साबित होगा।
भक्ति साहित्य और धार्मिक ग्रंथों की दुर्लभ प्रतियां मिलीं
अभियान के दौरान भारतीय भक्ति और काव्य परंपरा से जुड़ी कई अमूल्य पांडुलिपियां भी सामने आई हैं। इनमें वर्ष 1839 की संस्कृत में लिखित गीत गोविंद, 1856 की हस्तलिखित श्रीमद्भगवद्गीता तथा गजेंद्र मोक्ष से संबंधित प्राचीन प्रतियां शामिल हैं। इन दस्तावेजों को भारतीय धार्मिक और साहित्यिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।
इतिहास के महत्वपूर्ण शिलालेखों के अनुवाद भी मिले
सर्वेक्षण में मध्यभारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण अभिलेखीय दस्तावेज भी मिले हैं। इनमें रामनगर (मंडला) शिलालेख का हिंदी अनुवाद, 1867 में किया गया भोरमदेव शिलालेख का अनुवाद तथा 1898 का मड़वा महल शिलालेख का पद्यात्मक अनुवाद प्रमुख हैं। इन दस्तावेजों से क्षेत्र के ऐतिहासिक घटनाक्रम और सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद मिलेगी।
खगोल विज्ञान और वैदिक ज्ञान से जुड़ी पोथियां भी सामने आईं
अभियान में खगोल विज्ञान, ज्योतिष और वैदिक चिंतन से संबंधित कई दुर्लभ पोथियों की भी पहचान की गई है। इनमें ब्रह्मांड के चित्रांकन से जुड़े संस्कृत दस्तावेज और जैमिनी परंपरा की पोथियां शामिल हैं, जो प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक और दार्शनिक ज्ञान की झलक प्रस्तुत करती हैं।
निजी संग्रहों से मिलीं दुर्लभ धरोहरें
प्राप्त दस्तावेजों में अधिकांश पांडुलिपियां कवर्धा निवासी आदित्य श्रीवास्तव और अजय कुमार चंद्रवंशी के निजी संग्रह से मिली हैं। वहीं ग्राम बसनी निवासी सुभाष पाण्डेय के संग्रह से महामृत्युंजय स्रोत, संध्या विधि, तांत्रिक संध्या, श्राद्ध पद्धति और जलाशयराम मठोत्सर्ग विधि जैसी दुर्लभ वैदिक एवं तांत्रिक पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं।
होगा डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण
वर्षों से निजी स्तर पर संरक्षित इन ऐतिहासिक दस्तावेजों का अब डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इनके अध्ययन से छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, स्थापत्य कला, धार्मिक परंपराओं और प्राचीन भारतीय विज्ञान के कई नए पहलू सामने आ सकते हैं।
नागरिकों से सहयोग की अपील
कलेक्टर गोपाल वर्मा ने जिले के नागरिकों से अपील की है कि यदि उनके पास कोई प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ, वंशावली, पोथी या ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित हैं, तो इसकी जानकारी जिला प्रशासन को दें। नागरिक ‘ज्ञान भारतम्’ मोबाइल ऐप के माध्यम से भी अपने दस्तावेजों का ऑनलाइन पंजीयन कर राष्ट्रीय संरक्षण अभियान में सहभागिता कर सकते हैं।

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