एक साल में ही भसक गई करोड़ों की खट्टी माइनर

किसानों के लिए नहीं अधिकारियों की जेब भरने के लिए बनी नहर



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पब्लिक स्वर,राजिम/गरियाबंद। किसानों की हजारों एकड़ भूमि को सिंचाई सुविधा देने के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई खट्टी माइनर महज एक वर्ष के भीतर ही भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की कहानी बयां करने लगी है। पाण्डुका माइनर-1 से निकली यह नहर जगह-जगह टूट रही है, दरारों से भर चुकी है और निर्माण के साथ हुई रिपेयरिंग अब साफ दिखाई देने लगी है। क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों में जल संसाधन विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है।

सबसे गंभीर आरोप विभाग के कार्यपालन अभियंता एस.के. बर्मन की कार्यप्रणाली को लेकर लगाए जा रहे हैं।ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय संरक्षण के कारण ठेकेदारों ने खुलेआम घटिया निर्माण कर करोड़ों रुपए की राशि डकार ली और अब अधिकारी पूरे मामले पर पर्दा डालने में जुटे हैं।

एक साल भी नहीं टिक पाई करोड़ों की नहर

रजनकटा, खट्टी, कुरूद, सड़कड़ा और पाण्डुका क्षेत्र के लगभग 500 से अधिक किसानों की हजारों एकड़ कृषि भूमि तक सिंचाई पहुंचाने के उद्देश्य से इस माइनर का निर्माण कराया गया था।लेकिन इसके उलट नहर की साइड वॉल, स्लीपर और बेड में निर्धारित मानकों को ताक पर रखकर मात्र 1 से 2 इंच से भी कम मोटाई की ढलाई कर करोड़ों रुपये के सरकारी धन का बंदरबांट किया गया। कई स्थानों पर कंक्रीट उखड़ चुकी है और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।कई हिस्सों में बड़े बड़े गड्ढे हो गए हैं और सीमेंट की परत उखड़ रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण शुरू होने के साथ ही रिपेयरिंग का खेल भी शुरू हो गया था। अब मरम्मत के निशान साफ दिखाई दे रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि निर्माण कार्य शुरुआत से ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका था।

“नहर की ढलाई के नाम पर अधिकारियों ने खाई मलाई और किसानों को छोड़ा भगवान भरोसे”

स्थानीय किसानों के अनुसार नहर की ढलाई की मोटाई मात्र एक से डेढ़ इंच रखी गई है। तकनीकी मानकों को ताक में रखकर बेहद घटिया निर्माण सामाग्री का उपयोग किया गया। किसानों का कहना है कि पहली तेज बारिश में ही नहर का अस्तित्व खत्म हो सकता है।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कुलापा, ड्रेनेज और सोकपीट जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं तक नहीं बनाई गईं। इससे पानी निकासी की व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित है और आसपास के क्षेत्रों में खतरा बढ़ गया है।

पारदर्शिता पर भी सवाल

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि करोड़ों रुपए के इस निर्माण कार्य में पारदर्शिता पूरी तरह गायब है। कार्य स्थल पर निर्माण एजेंसी, लागत, तकनीकी स्वीकृति और कार्य अवधि संबंधी कोई सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। इससे ग्रामीणों में संदेह और गहरा गया है कि कहीं बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार तो नहीं किया जा रहा।


घास से पट गई नहर, मेंटेनेंस के नाम पर फिर खेल की तैयारी?

नहर के कई हिस्सों में जंगली घास और पौधे उग आए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग जानबूझकर सफाई और रखरखाव नहीं करा रहा ताकि भविष्य में मेंटेनेंस के नाम पर फिर लाखों-करोड़ों रुपए का फंड निकालकर बंदरबांट की जा सके।

सिर्फ खट्टी नहीं आमा नाला,पितईबंद सहित कई क्षेत्रों में, एस.के. बर्मन पर गंभीर आरोप

ग्रामीणों और किसानों ने कार्यपालन अभियंता एस.के. बर्मन पर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विगत चार वर्षों से वे एक ही स्थान पर जमे हुए हैं और विभाग में मनमानी चरम पर है।फिर भी इनपर कार्यवाही करने छोड़ उनकी पदोन्नति कर दी गई है।यहां तक कि  लोगों ने पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भ्रष्टाचार उजागर होने पर पी.के. आनंद और ए.के. सारस्वत जैसे अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया था, लेकिन वर्तमान में गंभीर शिकायतों और स्पष्ट अनियमितताओं के बावजूद एस.के. बर्मन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही।

किसानों के सवाल, जिनका जवाब नहीं

करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद नहर एक वर्ष में ही जर्जर कैसे हो गई?
निर्माण के साथ ही रिपेयरिंग क्यों करनी पड़ी?
घटिया सामग्री उपयोग करने वाले ठेकेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?
क्या मेंटेनेंस के नाम पर दोबारा सरकारी राशि निकालने की तैयारी है?
किसानों को सिंचाई मिलेगी या सिर्फ भ्रष्टाचार की कीमत चुकानी पड़ेगी?

जांच नहीं हुई तो होगा आंदोलन

क्षेत्र के किसानों ने पूरे निर्माण कार्य की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराने, दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर एफआईआर दर्ज करने तथा निर्माण गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन और जनआक्रोश प्रदर्शन के लिए मजबूर होंगे।

अगले अंक में :जल संसाधन गरियाबंद में 66 करोड़ का महाघोटाला बने रहें पब्लिक स्वर के साथ



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