अभनपुर post authorUser 1 22 March 2026

दोषी अफसरों पर कोई कार्यवाही नहीं,रायपुर प्रशासन पर गंभीर सवाल



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पब्लिक स्वर,अभनपुर। अभनपुर क्षेत्र में जमीन फर्जीवाड़े का एक गंभीर मामला सामने आने के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो पाना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। खोरपा तहसील से जुड़ा यह मामला न केवल राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि इसमें शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका को भी संदेह के घेरे में लाता है।

क्या है मामला

सूत्रों के अनुसार, खोरपा तहसील में एक मृत व्यक्ति को जीवित दर्शाकर उसकी जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई। इस प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति को खड़ा कर दस्तावेजी औपचारिकताएं पूरी कराई गईं। प्रारंभिक जांच में इस फर्जीवाड़े में दर्जनों लोगों के नाम सामने आने की बात कही गई थी।

कार्रवाई के दावे, लेकिन जमीनी हकीकत शून्य

मामला उजागर होने के बाद प्रशासन ने जांच कर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया था। हालांकि, लंबे समय बीत जाने के बाद भी न तो जांच पूरी हो सकी है और न ही किसी जिम्मेदार पर कार्रवाई हुई है। कई संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए आवेदन भी दिए गए, लेकिन उस दिशा में भी कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी।

तहसील में नियमों का उल्लंघन

मामले का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि खोरपा तहसील में शासन के नियमों के विपरीत निजी कर्मचारियों से काम करवाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, इन निजी कर्मियों को तहसील कार्यालय के भीतर बाकायदा टेबल-कुर्सी उपलब्ध कराई गई है और वे नियमित कर्मचारियों की तरह काम करते नजर आ रहे हैं।

वीडियो सबूत भी सामने

सूत्रों ने इस संबंध में एक वीडियो भी साझा किया है, जिसमें निजी कर्मचारी सरकारी दफ्तर के भीतर बैठकर काम करते दिख रहे हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि संवेदनशील दस्तावेजों की सुरक्षा और वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

सिस्टम की कमजोरी या मिलीभगत?

विशेषज्ञों की मानें तो इस तरह के मामलों में केवल तकनीकी खामियां जिम्मेदार नहीं होतीं, बल्कि कई स्तरों पर मिलीभगत की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मृत व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री होना यह संकेत देता है कि पहचान सत्यापन और दस्तावेज जांच की प्रक्रिया या तो कमजोर है या जानबूझकर नजरअंदाज की गई।

उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

जांच में देरी और कार्रवाई का अभाव उच्च पदस्थ अधिकारियों की निगरानी क्षमता पर भी सवाल उठाता है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह के फर्जीवाड़े आगे भी दोहराए जा सकते हैं।



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