CG NEWS: क्यों मनाया जाता है मुहर्रम,जानें इतिहास और महत्व



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पब्लिक स्वर,कोंडागांव। दुनियाभर में शिया मुस्लिम इमाम हुसैन और उनकी समर्थकों के शहादत की याद में मुहर्रम मनाते हैं। बतादे कि इमाम हुसैन, पैगंबर मोहम्मद के नाती थे, जो कर्बला की जंग में शहीद हुए थे। मुहर्रम क्यों मनाया जाता है, इसके लिए हमें तारीख के उस हिस्से में जाना होगा, जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफा का राज था। जो की पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता होता था। पैगंबर साहब की वफात के बाद चार खलीफा चुने गए थे जिन्हे लोगों ने आपस में तय करके उनका चुनाव करते थे।


ज्ञात हो कि इसके लगभग 50 साल बाद इस्लामी दुनिया में घोर अत्याचार का दौर आया था इस दौरान मक्का से दूर सीरिया के गर्वनर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया, वही उसके काम करने का तरीका बादशाहों जैसा था, जो उस समय इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ था, तब इमाम हुसैन ने यजीद को खलीफा मानने से इनकार कर दिया। इससे नाराज यजीद ने अपने राज्यपाल वलीद पुत्र अतुवा को फरमान लिखा, "तुम हुसैन को बुलाकर मेरे आदेश का पालन करने को कहो, अगर वो नहीं माने तो उसका सिर काटकर मेरे पास भेजा जाए।" जिसके बाद राज्यपाल ने हुसैन को राजभवन बुलाया और उनको यजीद का फरमान सुनाया। इस पर हुसैन ने कहा- "मैं एक व्याभिचारी, भ्रष्टाचारी और खुदा रसूल को न मानने वाले यजीद का आदेश नहीं मान सकता।" इसके बाद इमाम हुसैन मक्का शरीफ पहुंचे, ताकि हज पूरा कर सकें। इस दौरान यजीद ने अपने सैनिकों को यात्री बनाकर हुसैन का कत्ल करने के लिए भेजा। इस बात का पता हुसैन को चल गया पर मक्का ऐसा पवित्र स्थान है, जहां किसी की भी हत्या हराम है। इसलिए उन्होंने खून-खराबे से बचने के लिए हुसैन ने हज के बजाय उसकी छोटी प्रथा उमरा करके परिवार सहित इराक चले आ गए। मुहर्रम महीने की दो तरीख 61 हिजरी को हुसैन अपने परिवार के साथ कर्बला में थे इस दौरान नौ तारीख तक यजीद की सेना को सही रास्ते पर लाने के लिए समझाइश देते रहे, लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद हुसैन ने कहा- "तुम मुझे एक रात की मोहलत दो..ताकि मैं अल्लाह की इबादत कर सकूं" इस रात को "आशुर की रात" कहा जाता है, गले दिन जंग में हुसैन के 72 समर्थक मारे गए। जिसके बाद सिर्फ हुसैन अकेले रह गए थे, लेकिन तभी अचानक खेमे में शोर सुना, इस दौरान उनका छह महीने का बेटा अली असगर प्यास से बेहाल था। जिसके बाद हुसैन उसे हाथों में उठाकर मैदान-ए-कर्बला में ले आए। उन्होंने यजीद की फौज से बेटे को पानी पिलाने के लिए कहा, लेकिन फौज नहीं मानी और बेटे ने हुसैन की हाथों में तड़प कर दम तोड़ दिया। इसके बाद भूखे-प्यासे हजरत इमाम हुसैन का भी कत्ल कर दिया गया। हुसैन ने इस्लाम और मानवता के लिए अपनी जान कुर्बान की थी। इस इसे आशुर यानी मातम का दिन कहा जाता है, इराक की राजधानी बगदाद के दक्षिण पश्चिम के कर्बला में इमाम हुसैन और इमाम अब्बास के तीर्थ स्थल हैं।

 

इधर इसी कड़ी में 16 जुलाई को कोंडागाँव कोतवाली पुलिस के द्वारा 17 जुलाई को होने वाले त्यौहार को देखते हुए बरसते बारिश में शांति समिति की बैठक बुलाई गई। बैठक में कोंडागाँव नगर के सभी समाज के सम्मानीय व्यक्तियों को बुला कर शांति समिति पर चर्चा की गई, इस दौरान चर्चा का मूल उद्देश्य रहा कि बाहरी व्यक्तियों जो क्राइम करते है उनपे नजर रखना, कानून को अपने हाथ मे न लेते हुए अत्यधिक तेज आवाज में किसी भी प्रकार का साउंड सिस्टम न बजाने, हथियारों का प्रयोग न करने की समझाईश दी गई। साथ ही मोहर्रम पर्व पर चर्चा की गई, उक्त बैठक में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सतीश भार्गव, अनुविभागीय पुलिस रूपेश कुमार, कोतवाली प्रभारी शौरभ, उपाध्यक्ष व अनुविभागीय राजस्व अधिकारी निकिता मरकाम के साथ साथ सभी समाज के लोग मौजूद रहे।




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