पब्लिक स्वर,गीदम। आदिवासी संस्कृति और आस्था का प्रतीक ‘गीदम मड़ई’ इस वर्ष अपनी भव्यता से ज्यादा विवादों के कारण चर्चा में है। बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के आगमन और पारंपरिक रीति-रिवाजों वाले इस मेले पर अब सत्ता के अहंकार एवं परिवारवाद नजर आ रहा है।
ताजा विवाद संरक्षक मंडल की सूची से नगर के उन वरिष्ठ बुजुर्गों और प्रतिष्ठित लोगों के नाम हटाने को लेकर शुरू हुआ है, जिन्होंने इस मेले को इस आयाम पर पहुंचाया और उन्हीं वरिष्ठ बुजुर्गों के मेहनत का नतीजा है कि नगर के वरिष्ठजनों के साथ मिलकर इस मेले की नींव डाली गई थी।
30 साल बाद मेला शुरू कराने वाले ही आज अपमानित हो रहे हैं
गीदम मड़ई का अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है। वर्षों पहले वाद विवाद के बाद प्रशासन ने इस मेले पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। करीब 30 साल तक बंद रहने के बाद इस मेले को तत्कालीन सरपंच जयकिशोर शर्मा एवं सामाजिक बुद्धिजीवी, नगर के सभी वर्ग और समुदाय के प्रयासों से दोबारा शुरू किया गया।
उन्होंने अपने 20 साल के कार्यकाल में 20 बार इस भव्य आयोजन को सफलतापूर्वक कराया और माँ दंतेश्वरी के छत्र को मड़ई तक लाने की परंपरा को जीवित रखा।
लेकिन इस वर्ष नगर पंचायत द्वारा जारी पोस्टरों और सूचियों से जयकिशोर शर्मा सहित कई प्रतिष्ठित व्यापारियों और वरिष्ठ बुजुर्गों के नाम हटा दिए गए हैं।जिससे नगर के वासी अपने आप में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
राजनीति और परिवारवाद हावी
अब नगरवासियों का आरोप है कि मेले के आयोजन में राजनीति एवं परिवारवाद हावी हो चुका है।

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